भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा ‘टॉवर ऑफ जस्टिस’ का उद्घाटन और कहा— न्यायपालिका का दक्ष एवं निष्पक्ष होना अनिवार्य

पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन

संदर्भ

  • भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने गुरुग्राम में “टॉवर ऑफ जस्टिस” नामक नवीन न्यायिक परिसर का उद्घाटन किया। इस आधुनिक परिसर में 56 न्यायालय कक्ष तथा डिजिटल अवसंरचना की व्यवस्था की गई है।

मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणियाँ

  • उन्होंने इस बात पर बल दिया कि न्यायिक सुधारों का उद्देश्य केवल मामलों के शीघ्र निस्तारण तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि प्राथमिकता सदैव ऐसी न्यायिक व्यवस्था की स्थापना होनी चाहिए जो दक्ष एवं निष्पक्ष हो।
    • यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कोई भी नागरिक आर्थिक, सामाजिक अथवा प्रक्रियागत बाधाओं के कारण न्याय से वंचित न रहे।
  • लक्ष्य ऐसी न्यायपालिका का निर्माण करना है जो आधुनिक होने के साथ-साथ मानवीय, प्रौद्योगिकी से सुसज्जित होने के साथ-साथ संवैधानिक मूल्यों पर दृढ़ता से आधारित, तथा प्रत्येक वाद के पीछे निहित मानवीय जीवन को समझने वाली संवेदनशील संस्था हो।

भारत में न्यायपालिका

  • उच्चतम न्यायालय : यह भारत का सर्वोच्च न्यायालय है, जिसे संविधान की व्याख्या करने, राज्यों एवं केंद्र के मध्य विवादों का निपटारा करने तथा कानूनों एवं सरकारी कार्यवाहियों की वैधता की न्यायिक समीक्षा करने का अधिकार प्राप्त है।
  • उच्च न्यायालय : प्रत्येक राज्य अथवा राज्यों के समूह के लिए एक उच्च न्यायालय होता है, जो अधीनस्थ न्यायालयों से आने वाली अपीलों तथा राज्य स्तर के विधिक मामलों की सुनवाई करता है।
  • जिला न्यायालय : ये जिला स्तर पर दीवानी एवं आपराधिक मामलों की सुनवाई करते हैं। इनके अतिरिक्त परिवार न्यायालय, उपभोक्ता न्यायालय तथा श्रम न्यायालय जैसे विभिन्न विशेष न्यायालय भी कार्यरत हैं।
  • न्यायपालिका की प्रत्येक इकाई स्वतंत्र रूप से कार्य करती है, किंतु सभी संस्थाएँ परस्पर समन्वय के साथ कार्य करने हेतु अभिकल्पित हैं, जिससे नियंत्रण एवं संतुलन की व्यवस्था सुनिश्चित होती है तथा संविधान के अनुरूप निष्पक्ष शासन को बढ़ावा मिलता है।

भारत की न्यायिक व्यवस्था के समक्ष चुनौतियाँ

  • मामलों का लंबित होना: ‘स्टेट ऑफ द जुडिशियरी’ रिपोर्ट के अनुसार, भारत के उच्च एवं अधीनस्थ न्यायालयों में 5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं।
    • इन मामलों के निस्तारण हेतु उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालयों एवं जिला न्यायालयों में कुल मिलाकर केवल 20,580 न्यायाधीश कार्यरत हैं।
  • न्यायिक अवसंरचना: अनेक न्यायालयों में आधारभूत अवसंरचना एवं आधुनिक प्रौद्योगिकी का अभाव है, जिससे उनकी कार्यकुशलता प्रभावित होती है।
    • राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) के अनुसार, 19.7% जिला न्यायालयों में महिलाओं के लिए पृथक शौचालय उपलब्ध नहीं हैं।
  • न्यायिक रिक्तियाँ: देश के उच्च न्यायालयों में 1,114 स्वीकृत न्यायाधीश पदों के विरुद्ध 347 पद रिक्त हैं।
    • इसी प्रकार, जिला न्यायपालिका में 25,081 स्वीकृत पदों में से लगभग 5,300 जिला न्यायाधीशों के पद रिक्त हैं।
  • समावेशिता: वर्तमान में भारत के उच्चतम न्यायालय में केवल दो महिला न्यायाधीश कार्यरत हैं।
    • वर्ष 2014 से अब तक उच्च न्यायालयों में 170 महिला न्यायाधीशों की नियुक्ति की गई है, जिनमें से विगत पाँच वर्षों में 96 तथा उच्चतम न्यायालय में 6 महिला न्यायाधीश नियुक्त हुई हैं।
    • इसके विपरीत, जिला न्यायपालिका में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, जहाँ 36.33% न्यायाधीश महिलाएँ हैं।

समस्या के समाधान हेतु किए गए प्रमुख प्रयास

  • सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) का उपयोग: न्यायिक प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी एवं पारदर्शी बनाने के लिए सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) का व्यापक उपयोग किया जा रहा है।
  • इलेक्ट्रॉनिक सर्वोच्च न्यायालय रिपोर्ट (e-SCR) परियोजना: e-SCR परियोजना के माध्यम से उच्चतम न्यायालय के निर्णयों का डिजिटल संस्करण उपलब्ध कराया जा रहा है।
  • वर्चुअल न्यायालय प्रणाली: नियमित न्यायिक कार्यवाहियाँ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से आभासी (Virtual) रूप में संचालित की जा रही हैं।
  • ई-न्यायालय पोर्टल: यह वादकारियों, अधिवक्ताओं, सरकारी एजेंसियों, पुलिस तथा आम नागरिकों सहित सभी हितधारकों के लिए एकीकृत डिजिटल मंच उपलब्ध कराता है।
  • राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG): इसके माध्यम से राष्ट्रीय, राज्य, जिला एवं व्यक्तिगत न्यायालय स्तर पर लंबित मामलों के आँकड़े आम जनता, शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों तथा अन्य हितधारकों के लिए सुलभ बनाए गए हैं।
  • न्यायिक सुधार: न्यायिक सुधारों के अंतर्गत न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि, न्यायालयों के आधुनिकीकरण तथा ई-न्यायालय एवं डिजिटल प्रौद्योगिकी के उपयोग द्वारा मामलों के शीघ्र निस्तारण पर बल दिया जा रहा है।
  • वैकल्पिक विवाद निपटान (ADR): मध्यस्थता , पंचाट एवं सुलह जैसी वैकल्पिक विवाद निपटान (ADR) प्रणालियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि न्यायालयों पर भार कम हो सके।
  • वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 के अंतर्गत वाणिज्यिक विवादों में वाद दायर करने से पूर्व अनिवार्य मध्यस्थता एवं समझौते का प्रावधान किया गया है।
  • फास्ट ट्रैक न्यायालय: जघन्य अपराधों, वरिष्ठ नागरिकों, महिलाओं एवं बच्चों से संबंधित मामलों के शीघ्र निस्तारण तथा लंबित मामलों की संख्या कम करने के उद्देश्य से फास्ट ट्रैक न्यायालयों की स्थापना की जा रही है।

आगे की राह

  • कार्यभार एवं क्षमता: नए मामलों के आगमन और उनके निस्तारण के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए न्यायालयों को अपनी वर्तमान 71% कार्य क्षमता से अधिक दक्षता के साथ कार्य करना होगा।
  • न्यायिक रिक्तियों की शीघ्र पूर्ति: जिला न्यायालयों में न्यायिक रिक्तियाँ लगभग 28% हैं। इन रिक्तियों की समयबद्ध पूर्ति तथा नियमित भर्ती सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक भर्ती कैलेंडर का मानकीकरण आवश्यक है।
  • जिला स्तरीय वाद प्रबंधन समितियाँ: जिला स्तर पर वाद प्रबंधन समितियों का गठन किया जाना चाहिए, जो लक्षित मामलों की पहचान, अभिलेखों के पुनर्निर्माण तथा मामलों के प्रभावी प्रबंधन का कार्य करें।
  • मलिमथ समिति (2003) की अनुशंसा: मलिमथ समिति (2003) ने अपनी रिपोर्ट में लंबित मामलों की अधिकता को देखते हुए न्यायालयों के अवकाश की अवधि में 21 दिनों की कमी करने की अनुशंसा की थी।
  • जिला न्यायपालिका एवं उच्च न्यायालयों के मध्य अंतर का समापन: जिला न्यायपालिका एवं उच्च न्यायालयों के बीच विद्यमान धारणात्मक एवं संस्थागत अंतर को समाप्त किया जाना चाहिए। यह अंतर औपनिवेशिक अधीनता की विरासत के रूप में देखा जाता है। इसे दूर कर एक अधिक समन्वित, सुदृढ़ एवं एकीकृत न्यायिक व्यवस्था का निर्माण किया जाना आवश्यक है।

Source: TH

 

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